
शहर, स्पा और चंचल
"शहर, स्पा और चंचल (देह एक, ज़ख्म अनेक)" उपन्यास आधुनिक समाज की उस सच्चाई को उजागर करता है, जिसे अक्सर चमक-दमक के पीछे छुपा दिया जाता है।
"शहर, स्पा और चंचल (देह एक, ज़ख्म अनेक)" एक ऐसी युवती की कहानी है, जो परिस्थितियों, शोषण और समाज की दोहरी मानसिकता के बीच अपनी पहचान और सम्मान की लड़ाई लड़ती है।
यह कहानी केवल चंचल की नहीं, बल्कि उन अनगिनत महिलाओं की आवाज़ है, जिनकी पीड़ा को समाज अनदेखा कर देता है।
उपन्यास में स्पा इंडस्ट्री के पीछे छिपे अंधेरे सच, मानव तस्करी, मानसिक संघर्ष और आत्मसम्मान की जंग को बेहद संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है।
यह पुस्तक पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर दोष किसका है, परिस्थितियों का, समाज का या हमारी चुप्पी का ?
यह एक सामाजिक, यथार्थवादी और भावनात्मक कहानी है, जो आपको भीतर तक झकझोर देगी। "शहर, स्पा और चंचल (देह एक, ज़ख्म अनेक)" सिर्फ़ एक कहानी नहीं, एक अनुभव है। एक ऐसी यात्रा, जो दर्द से शुरू होती है, साहस से गुजरती है, और उम्मीद पर खत्म होती है ।
यह एक मौलिक हिंदी रचना है और किसी भी अन्य स्रोत से कॉपी नहीं की गई है।
-एडवोकेट नवल किशोर सोनी
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"शहर, स्पा और चंचल (देह एक, ज़ख्म अनेक)" उपन्यास आधुनिक समाज की उस सच्चाई को उजागर करता है, जिसे अक्सर चमक-दमक के पीछे छुपा दिया जाता है।
"शहर, स्पा और चंचल (देह एक, ज़ख्म अनेक)" एक ऐसी युवती की कहानी है, जो परिस्थितियों, शोषण और समाज की दोहरी मानसिकता के बीच अपनी पहचान और सम्मान की लड़ाई लड़ती है।
यह कहानी केवल चंचल की नहीं, बल्कि उन अनगिनत महिलाओं की आवाज़ है, जिनकी पीड़ा को समाज अनदेखा कर देता है।
उपन्यास में स्पा इंडस्ट्री के पीछे छिपे अंधेरे सच, मानव तस्करी, मानसिक संघर्ष और आत्मसम्मान की जंग को बेहद संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है।
यह पुस्तक पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर दोष किसका है, परिस्थितियों का, समाज का या हमारी चुप्पी का ?
यह एक सामाजिक, यथार्थवादी और भावनात्मक कहानी है, जो आपको भीतर तक झकझोर देगी। "शहर, स्पा और चंचल (देह एक, ज़ख्म अनेक)" सिर्फ़ एक कहानी नहीं, एक अनुभव है। एक ऐसी यात्रा, जो दर्द से शुरू होती है, साहस से गुजरती है, और उम्मीद पर खत्म होती है ।
यह एक मौलिक हिंदी रचना है और किसी भी अन्य स्रोत से कॉपी नहीं की गई है।
-एडवोकेट नवल किशोर सोनी











